संस्कार की भाषा वेद है और वर्तमान की अपभ्रंश भाषा को वेदोन्मुख करना भाषा का संस्कार है। वेद भाषा के बिना ज्ञान की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। ज्ञान कर्म का बीज है। कर्म अपूर्व या संस्कार का बीज है। मोक्ष, स्वर्ग, देव, कर्म, ज्ञान, संस्कार आदि का विवरण वेद से मिलता है। वेद वैदिक भाषा या वैदिक संस्कृत में रचे गए हैं। वेद की शब्द भाव अर्थ रचना सुव्यवस्थित है। महामहोपाध्याय गिरधर शर्मा चतुर्वेदी वैदिक विद्वान और भारतीय संस्कृति पुस्तक के पृष्ठ 46 पर लिखते हैं कि ”वेदों की शब्द रचना सुव्यवस्थित है। प्रमाण शब्दों में जिस प्रकार का कार्य कारण भाव का विवरण होना चाहिए और साध्य-साधन इति कर्तव्यता रूप तीनों अंशों की परिपूर्ति जिस प्रकार से विद्वान के शब्दों में होनी चाहिए, उसी प्रकार की वेदों में देखी जाती है।“ यही कारण है कि हमें वेद भाषा को संस्कार की भाषा कहना पड़ता है। वेद भाषा की एक और विशिष्टता यह है कि इसका अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द, मन्त्र-मन्त्र, सूक्त-सूक्त और वेद-वेद रचना भाव अर्थ सम्प्रेषण अनुशासनबद्ध है। वेद भाषा की एक विशिष्टता यह भी है कि यह व्यावहारिक विज्ञान सिक्त है। विज्ञान, कर्म, ज्ञान और उपासना ये चार वेद के विषय हैं और ये चार ही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास अर्थात् आश्रम के आधार हैं। इस सन्दर्भ में भी वेद व्यावहारिक या एप्लाइड विज्ञान है कि वेद की भाषिक आधार विद् धातु का अर्थ सत्ता के लिए, लाभ के लिए, उपयोग के लिए और विचार के लिए है। इस प्रकार वेद भाषा संस्कारिक भाषा है। इसीलिए यह संस्कार की भाषा भी है। संस्कार की भाषा संसार के माध्यम से मानव का संस्कार करती है। संस्कार शब्द का अर्थ भूषणभूत सम्यकीकरण है। मनुष्य के सन्दर्भ में जिस कर्म से मानव के तन, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, धी, चित्त और आत्मा उत्तम हो वह संस्कार है। भाषा के सन्दर्भ में जिस भाषा में ‘अ’ पंचस्वर, उपस्वर, वर्ण, उपवर्ण, शब्द, उपशब्द (व्याकरण), अर्थ (निरुक्ति), छन्द (पिंगल) का अनुशासनबद्ध उत्तम प्रयोग हो वह सुसंस्कारिक भाषा है। ‘अ’ सारी विश्वभाषाओं का आदि अक्षर है। इसमें अनुशासनबद्ध स्फोट से अऽ, इ, उ, ऋ, लृ पांच मूल स्वरों की उत्पत्ति हुई है। इनमें अऽ, इ, ऋ, उ इन चार स्वरों में ह्रस्व दीर्घ प्लुत भेद से बारह उपस्वर हुए। स्वर की परिभाषा यह है कि ये स्वयं एवं दूसरे को प्रकाशित करते हैं।
अ, इ, उ, ऋ, लृ क्रमशः कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ स्थानी हैं। इन स्वरों पर सहसा रोक लगाने से ह, य, र, ल, व वर्ण उभरते हैं। इनमें महत् दबाव, कोमलता, उच्चता, इकारता, अनुनास, विसर्ग का उपयोग वर्णमाला के अन्तस्थ, अंत्यस्थ और स्पृष्ट अक्षरों को उत्पन्न करता है। इस भाष शिक्षा के छः अंग हैं। 1. वर्ण, 2. स्वर, 3. मात्रा, 4. बल, 5. साम, 6. सन्तान। ये संस्कारित भाषा के अंग हैं।
अधम वाचक (भाषक) छः प्रकार के हैं- 1. गद्य को गाकर और पद्य को पाठ कर भाष करनेवाले। 2. शीघ्री या सरासरी तौर पर भाष करनेवाले। 3. सिर हिलाकर पाठ करनेवाले। 4. शब्द मात्र पढ़नेवाले। 5. अनर्थपूर्वक भाष करनेवाले। 6. बुदबुदाकर (अल्प कंठ) भाष करनेवाले।
उत्तम वाचक (भाषक) छः प्रकार के हैं- 1. मधुमय। 2. अक्षरभाव सहित भाष करते। 3. पदच्छेद क्रम विक्रम सहित भाष करते। 4. सुस्वर भाष करते। 5. धैर्यपूर्वक भाष करते। 6. लयबद्ध भाष करते।
कुसंस्कारित भाषा के सत्रह प्रकार हैं- 1. शंकित, 2. भीत, 3. आवेगित, 4. निरर्थ गहन, 5. अव्यक्त, 6. सानुनासिक, 7. काकस्वर, 8. खींचकर भाष, 9. स्थान-देश-काल-भटक, 10. बुदबुदाहट, 11. दांत पीसकर बोलना, 12. त्वरित, 13. निरस्त बोल, 14. विलम्बित भाष, 15. गदगद भाष, 16. परधारित भाष, 17. पीडित भाष। अधम भाष करनेवालों की भाषा अधम तथा कुसंस्कारित भाष करनेवालों की भाषा कुसंस्कारी होती है।
उपरोक्त स्वर, उपस्वर, वर्ण, उपवर्ण और भाष के अनुशासन को शिक्षाशास्त्र कहते हैं। इसके पश्चात 14 वर्ण एवं स्वर के सम्मिश्र सूत्रों के अनुशासन से शब्द वितान के नियमों का नाम व्याकरण शास्त्र, निघण्टु तथा निरुक्त शास्त्र के शब्द अर्थ भाव वितान के अनुशासन को निरुक्ति शास्त्र, छन्दों के अनुशासन को पिंगल शास्त्र, इन सबके आचरण में उतारने का नाम कल्प या श्रौत शास्त्र है। और इनके उपयोग से सृष्टि में व्याप्त शाश्वत प्राकृतिक नियमों को उद्भासित कर उनका अनुशासनपूर्वक पालन ज्योतिष शास्त्र है। इस प्रकार शिक्षा अनुशासन, व्याकरण अनुशासन, अर्थ अनुशासन, छन्द अनुशासन, आचरण अनुशासन और शाश्वत ऋजु अनुशासन के छै अंगों को मिलाकर बनी भाषा को संस्कारित भाषा कहते हैं। इस विवरण से स्पष्ट है भाषा का संस्कार एक अति तपसाध्य प्रक्रिया है। भाषा कोई नन्हे मुन्हे बच्चों का खेल नहीं है।
भारतीय संस्कृति संस्कारित भाषा का इतना आदर करती है कि इसमें शब्दों को ब्रह्म माना गया है। “शब्द है ब्रह्म” यह एक महाकाव्य है। शब्द ब्रह्म अशक्त मानव के लिए पहचानना असम्भव है। मीमांसा दर्शन का सूत्र 1/3/28 कहता है- ”शुद्ध शब्द ज्ञान की अशक्ति के कारण अपभ्रंश शब्दों का जन्म होता है।“ इससे स्पष्ट है कि सारे अपभ्रंश शब्द, सारे आधे-अधूरे शब्द, निरर्थ शब्द, मिलावटी शब्द, हिंगलीश शब्द, हिंगलीश भाषा कमजोरी या अशक्ति की निशानी है। अपनी कमजोरी या अशक्ति या भाषा अपाहिजता छिपाने के लिए भाषा कुसंस्कारी लोग सस्ती हिन्दी तथा हिंगलीश हिन्दी का स्वयं प्रयोग करते हैं तथा इसकी वकालत भी करते हैं। हमारा दायित्व है कि हम ऐसे लोगों को इनकी नाप सीमा तक काट दें।
आज भारतीय हिन्दी भाषा का संस्कार करना एक अति महती आवश्यकता है। यदि हिन्दी भाषा का वर्तमान में संस्कार न किया गया तो यह “जब व्ही मेट“, “किस्मत कनेक्शन”, “इमोशनल अत्याचार”, “ईलू-ईलू” आदि के रूप में संस्कृत के आचार्यों के मुंह से भी प्रयुक्त होते बिखर-बिखर ठेठ ग्रामीण भाषा से भी निम्न स्तर प्राप्त कर नष्ट होने के कगार तक पहुंच जाएगी। हिन्दी भाषा को संस्कारित करने के लिए महती आवश्यकता है कि हमें महर्षि दयानन्द सरस्वती, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिली शरण गुप्त, जैनेन्द्र, आचार्य चतुरसेन शाश्त्री, वृन्दावन लाल, कन्हैयालाल मुंशी, कुबेरनाथ राय मनुज, विद्यानिवास मिश्र, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा आदि-आदि की ही भाषा को हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में लागू करना होगा। साहित्य जगत् को संस्कारिक भाषा सूर्य से ओत-प्रोत करना होगा।
स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
ओ३म्..
ReplyDeleteआर्यवीर जी, हार्दिक अभिवादन-नमस्ते..!
एक जिज्ञाशा कहें, सुझाव कहें या फिर आलोचना कहें, यहाँ रखना चाहता हूँ:
हम आर्यजन पश्चिमी सभ्यता और संस्कारको घृणा करतेहैं, अपनी आर्य वैदिक सभ्यता और संस्कृति अपनाने के लिए मरमिटते हैं..!
मै आर्य समाज की जहां भी किसीका लेख, प्रचार या विज्ञापन देखताहूँ तो हर स्थान पर अपनी वैदिक आर्य पंचांग के स्थान पर ईसाई या पौराणिक पञ्चांगका और आर्य अक्षर के स्थान पर आंग्ल अक्षर का प्रयोग किया हुवा देखताहूँ..जैसे- चैत्र..बैशाख आदि महीना के स्थान पर जनवरी...फेब..दिसम्बर..या १,२,३ आदि के स्थान पर 1,2,3 आदि
क्या इसको सुधारा नहीं जा सकता..?
धन्यवाद..!
आपका शुभचिन्तक
-प्रेम आर्य
दोहा-कतर से