Wednesday, September 22, 2010

“परमात्मा और तुम ..!”

1.    याद रखो तुम अरबवें, खरबवें, नरबवें हो और परमात्मा पहला ही पहला है। परमात्मा दूसरा, न तीसरा, न चौथा, न पांचवां, न छठा, न सातवां, न आठवां, न नौवां, न दसवां, न सौवां, न करोड़वां, न अरबवां है वरन् पहला ही पहला है।
2.    जो दूसरा, तीसरा... करोड़वां, अरबवां परमात्मा पूजते हैं वे पहले तो अपने आप को धोखा देते हैं। वे परमात्मा नहीं झूठ पूजते हैं। वे झूठे और गलत होते हैं।
3.    गलत परमात्मा पूजक खुद के साथ-साथ परमात्मा को भी धोखा देते हैं। उन पर परमात्मा मानों हंसता है। उन्होंने स्वयं को स्वयं ही इस दयनीय स्थिति में डाला है।
4.    दशावतारों और कई कलियुगी भगवानों, इशों, बाबाओं, साइयों, बोध्ााओं, गुरुजियों आचार्यों, परमहंसों, स्वघोषित तथा मूढ़घोषित अवतारों में कहीं भी ईश्वर का नामोनिशान भी नहीं है। ये सारे के सारे भगवान भगवान नहीं गोरखधंधा हैं। दूसरे, तीसरे... करोड़वें आदि-आदि हैं। इन्होंने मानव को गलत-सलत, अड़िया-घटिया, बेअकल, अज्ञानी ही किया है। पर इसके साथ-साथ दुःखद स्थिति यह है कि ये सारे अपने आप को ज्ञानी समझते हैं।
5.    अपने जीवन में वे जितने घटिया परमात्मा पूजते हैं उतने ही वे पाखण्डी होते हैं।
6.    इससे बड़ा पाखण्ड और क्या हो सकता है कि काल से परे परमात्मा को लोग कालेश्वर मानें और अतिसीमित समय में सीमित रहनेवाली काली मूर्ति को वे कालेश्वर रूप में पूजें तथा उसका भौतिक प्रसाद भी खाएं।
7.    ब्रह्म या परमात्मा कालेश्वर है- काल के पार वर्तमान है। वह सतत अब$अब$अब=अब ही है। अर्थात् वह सदाही पहला है। तुम भी वह परमात्मा मत पूजो जो कभी था ही नहीं बीच में वर्तमान हुआ फिर बाद में रहा नहीं। मानसिक अपाहिजों का परमात्मा काल खण्डित या विकृत होता है।
8.    सावधान ! आठ, दस, पंद्रह दिन मात्र बैठाए गए परमात्मा किसी भी दृष्टि से परमात्मा नहीं होते हैं। इनको पूजनेवाला हर व्यक्ति मानसिक अपंग है क्योंकि वह चैतन्य है ये जड़ है। और अगर तथाकथित चैतन्य है तो अध्यारोपित मानव चैतन्यता मात्र कल्पित अंश है। घटिया की पूजा आदमी को घटिया ही करेगी। दस दिन का परमात्मा और तीन सौ पैंसठ दिन के तुम हो। तुम ऐसे परमात्माओं और देवियों से छत्तीस दशमलव पांच गुना बेहतर हो। जब बेहतर हो तो बेहतर रहो, अपनी बेहतरता का आदर करो। वह अनन्त परमात्मा पूजो जो अनन्त कालीन सम होने के कारण तुमसे बेहतर है।
9.    बौने लोग बौने परमात्मा चुनते हैं। अपंग लोग अपंग परमात्मा चुनते हैं। जड़ लोग जड़ परमात्मा चुनते हैं। दस दिनिया लोग दस दिनिया परमात्मा चुनते हैं। अप्राकृतिक लोग अप्राकृतिक परमात्मा चुनते हैं। स्वस्थ दो-दो हाथ-पांव, आंख, कान, नथुने, एक सिर, सामान्य धड़ आदि प्राकृतिक मनुष्य हैं। इससे हटकर शरीरवाला कोई भी हो वह अप्राकृतिक है। अतः पंच कसौटी खरा न उतरने के कारण मानव द्वारा अपूजनीय ही है।
10.    हास्यास्पद परमात्मा आदमी को भी हास्यास्पद बना दिया करते हैं। कार्टून परमात्मा आदमी को भी कार्टून बना देते हैं। क्या आप को नहीं दीखता कि कार्टून परमात्माओं का जुलूस निकलता है और सड़क पर फिल्मी प्यार गानों की धुनों पर हिजड़े लोग हाथ-पैर फैंकते हैं, ट्रकों पर वेश्याएं नाचती हैं और आप इसके लिए दान देते हैं।
11.    क्या आप को नहीं मालूम कि देवी पूजाओं, समारोहों, नाचों में कण्डोमों और कामोत्तेजक साधनों की बिक्री में तीन सौ प्रतिशत वृद्धि हो जाती है। ये सब इस बात के जीते-जागते प्रमाण हैं कि गलत भगवान, गलत देवियां पूजनेवाले लोग पतित ही नहीं महापतित हो जाते हैं। कार्टून भगवान पूजक घातक-पातक कार्टून हो जाते हैं।
12.    आपके कान थूकदान नहीं हैं। आप की आंखें कार्टून रूपदान नहीं हैं। आपका मन भीख दान या भीख कटोरा नहीं है। आपकी बुद्धि अज्ञान अविद्या दान नहीं है। अपनी रक्षा आप स्वयं करो।    
स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय