Tuesday, November 23, 2010

अवसर प्रबन्धन

    साक्षात्कार, परीक्षा, चुनौतिपूर्ण कार्य, अतिश्रेयस्कर कार्य मानव के लिए रुके नहीं रहते। तुम नहीं करोगे किसी और के माथे सफलता का टीका लग जाएगा। अवसर पीछे से गंजा होता है। निकल जाने पर पीछे से पकड़ नहीं सकते। अवसर रेतवत मुट्ठी से फिसल जाता है।
        का बरखा जब कृषि सुखानी,
        मन पछतै हे अवसर बीते,
        सब कुछ लुटा के होष में आए तो क्या किया?
        दिन में अगर चिराग जलाए तो क्या किया?
    अवसर प्रबन्धन के ही उपरोक्त सारे तथ्य हैं। नवीन अवसर गुर है अवसर न होने पर अवसर पैदा करो।
    भारतीय संस्कृति या सांस्कृतिक तकनीक अवधारणा उपरोक्त धारणाओं के साथ जीवन को ही अवसर मानती है। मानव जन्म ही उत्थान का महा अवसर है। आरोह इमं सुखं रथम्- सुख पूर्वक षरीर का आरोहण करो, मानव चोला दुर्लभ रे बन्दे, वृथा जन्म गंवायो, अतिदुर्लभ मानव तन पाए, झीनी रे बीनी चदरिया, आदि मानव जीवन को अवसर दर्षाते हैं।
    भरथरी की नजर में युवावस्था स्वास्थ्य स्वस्थ षरीर ही एक महान अवसर है। इस अवसर को खोना नहीं चाहिए। यदि घर को आग लग गई है और उस समय कोई कूप खनन का अतिश्रम करता है तो उसका क्या लाभ? भरथरी का यह सन्देष महान अवसर प्रबन्धन सन्देष है।
    सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृषः। अवसर को पकड़ने के लिए पूर्व तैयारी आवष्यक है। भरथरी के अनुसार संभावनाओं का ध्यान रखते हुए अवसर प्रबन्धन करना चाहिए। संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन का पूर्वाधार है। परियोजना प्रबन्धन की आत्मा संभावना प्रबन्धन को छोड़ देने के कारण कई कई परियोजनाएं पूर्णता के पथ से वर्षों दूर भटक गईं हैं।
    मानव लक्ष्य है आत्म कल्याण। आत्म कल्याण प्राप्त होता है पुरुषार्थ से। पुरुषार्थ का आधार तथ्य है उत्तम स्वास्थ्य। उत्तम स्वास्थ्य का सम्बन्ध है उम्र तथा इन्द्रियों से। भरथरी कहता है-
    जब तक ओजपूर्ण, स्वस्थ है यह षरीर और जरा दूर है, बुढापा दूर है, और इन्द्रियां हैं षक्ति आभर, और भरा हुआ है आयुष- आयु के प्रति उछाह, आयु के प्रति उत्साह, तथा क्षय ने नहीं घेरा है आयु को, तब तक मानव को जो बुद्धि भरा है आत्मकल्याण के लिए महान पुरुषार्थ कर लेना चाहिए। तन की अगर व्युत्पत्ति सामान्य भाषा में की जाए तो त $ न बनती है। अर्थात तब नहीं है जो वही है तन। अर्थात अब स्वस्थ है जो वह है तन। अब जब यह है स्वस्थ तो है अवसर तो कर ले इसका श्रेष्ठ उपयोग, पाले इससे आत्मकल्याण, यह भरथरी अवसर प्रबन्धन है।
    मेरा परिवार कमायु (कम आयु) रहा है। मेरे भतीजे की मृत्यु सत्ताइस वर्ष में हृदयाघात से, मेरे चचेरे भाइयों की मृत्यु 36 वर्ष और 52 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से, मेरे छोटे मामा की मृत्यु 52 वर्ष में पक्षाघात से, मेरे बडे मामा की मृत्यु 58 वर्ष में, मेरे माताजी की मृत्यु 56 वर्ष में (50 वर्ष में पक्षाघात एवं कैंसर पष्चात) हुई। मेरे पिताजी की मृत्यु 60 वर्ष में तथा भैया की मृत्यु भी साठ वर्ष में ही हुई। अर्थात मेरे परिवार की औसत आयु पचास वर्ष रही है। आज मैं करीब 62 वर्ष का हंू। लिखित उम्र 59 वर्ष है जो गलत है। मैं आज से सात-आठ वर्ष पूर्व ही सावधान हो गया था तथा अध्यात्म क्षेत्र मैंने द्रुत कार्य आरम्भ कर दिया था। उम्र सूत्र देखते ही गरीब बस्तियों में बच्चों के खेल रखने और लिखने के उद्देष्य से मैंने नौकरी से सेवानिवृत्ति ले ली है। फिर भी मुझे विलम्ब हो गया। काष मैंने भरथरी का संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन सूत्र पहले पढ़ा होता।
    अब है यह ‘तन’ और तब न होगा। यह कब न होगा कोई न है जानता। तो करो न अब जब है तन आत्म कल्याणार्थ या लक्ष्यप्राप्ति अर्थ अत्यन्त प्रयास। अव्यक्त है बीता कल अव्यक्त है आनेवाला कल। व्यक्त है अब अतः इसमें सतत प्रयत्न है भरथरी अवसर प्रबन्धन।
    यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरादूरतो।
    यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
    आत्मश्रेयसितावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्।
    सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृषः।।
भरथरी अवसर प्रबन्धन- ब्रह्मलीन डॉ.त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय

Monday, November 22, 2010

संस्कार की भाषा और भाषा का संस्कार

          संस्कार की भाषा वेद है और वर्तमान की अपभ्रंश भाषा को वेदोन्मुख करना भाषा का संस्कार है। वेद भाषा के बिना ज्ञान की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। ज्ञान कर्म का बीज है। कर्म अपूर्व या संस्कार का बीज है। मोक्ष, स्वर्ग, देव, कर्म, ज्ञान, संस्कार आदि का विवरण वेद से मिलता है। वेद वैदिक भाषा या वैदिक संस्कृत में रचे गए हैं। वेद की शब्द भाव अर्थ रचना सुव्यवस्थित है। महामहोपाध्याय गिरधर शर्मा चतुर्वेदी वैदिक विद्वान और भारतीय संस्कृति पुस्तक के पृष्ठ 46 पर लिखते हैं कि ”वेदों की शब्द रचना सुव्यवस्थित है। प्रमाण शब्दों में जिस प्रकार का कार्य कारण भाव का विवरण होना चाहिए और साध्य-साधन इति कर्तव्यता रूप तीनों अंशों की परिपूर्ति जिस प्रकार से विद्वान के शब्दों में होनी चाहिए, उसी प्रकार की वेदों में देखी जाती है।“ यही कारण है कि हमें वेद भाषा को संस्कार की भाषा कहना पड़ता है। वेद भाषा की एक और विशिष्टता यह है कि इसका अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द, मन्त्र-मन्त्र, सूक्त-सूक्त और वेद-वेद रचना भाव अर्थ सम्प्रेषण अनुशासनबद्ध है। वेद भाषा की एक विशिष्टता यह भी है कि यह व्यावहारिक विज्ञान सिक्त है। विज्ञान, कर्म, ज्ञान और उपासना ये चार वेद के विषय हैं और ये चार ही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास अर्थात् आश्रम के आधार हैं। इस सन्दर्भ में भी वेद व्यावहारिक या एप्लाइड विज्ञान है कि वेद की भाषिक आधार विद् धातु का अर्थ सत्ता के लिए, लाभ के लिए, उपयोग के लिए और विचार के लिए है। इस प्रकार वेद भाषा संस्कारिक भाषा है। इसीलिए यह संस्कार की भाषा भी है। संस्कार की भाषा संसार के माध्यम से मानव का संस्कार करती है। संस्कार शब्द का अर्थ भूषणभूत सम्यकीकरण है। मनुष्य के सन्दर्भ में जिस कर्म से मानव के तन, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, धी, चित्त और आत्मा उत्तम हो वह संस्कार है। भाषा के सन्दर्भ में जिस भाषा में ‘अ’ पंचस्वर, उपस्वर, वर्ण, उपवर्ण, शब्द, उपशब्द (व्याकरण), अर्थ (निरुक्ति), छन्द (पिंगल) का अनुशासनबद्ध उत्तम प्रयोग हो वह सुसंस्कारिक भाषा है। ‘अ’ सारी विश्वभाषाओं का आदि अक्षर है। इसमें अनुशासनबद्ध स्फोट से अऽ, इ, उ, ऋ, लृ पांच मूल स्वरों की उत्पत्ति हुई है। इनमें अऽ, इ, ऋ, उ इन चार स्वरों में ह्रस्व दीर्घ प्लुत भेद से बारह उपस्वर हुए। स्वर की परिभाषा यह है कि ये स्वयं एवं दूसरे को प्रकाशित करते हैं।
          अ, इ, उ, ऋ, लृ क्रमशः कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ स्थानी हैं। इन स्वरों पर सहसा रोक लगाने से ह, य, र, ल, व वर्ण उभरते हैं। इनमें महत् दबाव, कोमलता, उच्चता, इकारता, अनुनास, विसर्ग का उपयोग वर्णमाला के अन्तस्थ, अंत्यस्थ और स्पृष्ट अक्षरों को उत्पन्न करता है। इस भाष शिक्षा के छः अंग हैं। 1. वर्ण, 2. स्वर, 3. मात्रा, 4. बल, 5. साम, 6. सन्तान। ये संस्कारित भाषा के अंग हैं।
          अधम वाचक (भाषक) छः प्रकार के हैं- 1. गद्य को गाकर और पद्य को पाठ कर भाष करनेवाले। 2. शीघ्री या सरासरी तौर पर भाष करनेवाले। 3. सिर हिलाकर पाठ करनेवाले। 4. शब्द मात्र पढ़नेवाले। 5. अनर्थपूर्वक भाष करनेवाले। 6. बुदबुदाकर (अल्प कंठ) भाष करनेवाले।
         उत्तम वाचक (भाषक) छः प्रकार के हैं- 1. मधुमय। 2. अक्षरभाव सहित भाष करते। 3. पदच्छेद क्रम विक्रम सहित भाष करते। 4. सुस्वर भाष करते। 5. धैर्यपूर्वक भाष करते। 6. लयबद्ध भाष करते।
         कुसंस्कारित भाषा के सत्रह प्रकार हैं- 1. शंकित, 2. भीत, 3. आवेगित, 4. निरर्थ गहन, 5. अव्यक्त, 6. सानुनासिक, 7. काकस्वर, 8. खींचकर भाष, 9. स्थान-देश-काल-भटक, 10. बुदबुदाहट, 11. दांत पीसकर बोलना, 12. त्वरित, 13. निरस्त बोल, 14. विलम्बित भाष, 15. गदगद भाष, 16. परधारित भाष, 17. पीडित भाष। अधम भाष करनेवालों की भाषा अधम तथा कुसंस्कारित भाष करनेवालों की भाषा कुसंस्कारी होती है।
          उपरोक्त स्वर, उपस्वर, वर्ण, उपवर्ण और भाष के अनुशासन को शिक्षाशास्त्र कहते हैं। इसके पश्चात 14 वर्ण एवं स्वर के सम्मिश्र सूत्रों के अनुशासन से शब्द वितान के नियमों का नाम व्याकरण शास्त्र, निघण्टु तथा निरुक्त शास्त्र के शब्द अर्थ भाव वितान के अनुशासन को निरुक्ति शास्त्र, छन्दों के अनुशासन को पिंगल शास्त्र, इन सबके आचरण में उतारने का नाम कल्प या श्रौत शास्त्र है। और इनके उपयोग से सृष्टि में व्याप्त शाश्वत प्राकृतिक नियमों को उद्भासित कर उनका अनुशासनपूर्वक पालन ज्योतिष शास्त्र है। इस प्रकार शिक्षा अनुशासन, व्याकरण अनुशासन, अर्थ अनुशासन, छन्द अनुशासन, आचरण अनुशासन और शाश्वत ऋजु अनुशासन के छै अंगों को मिलाकर बनी भाषा को संस्कारित भाषा कहते हैं। इस विवरण से स्पष्ट है भाषा का संस्कार एक अति तपसाध्य प्रक्रिया है। भाषा कोई नन्हे मुन्हे बच्चों का खेल नहीं है।
          भारतीय संस्कृति संस्कारित भाषा का इतना आदर करती है कि इसमें शब्दों को ब्रह्म माना गया है। “शब्द है ब्रह्म” यह एक महाकाव्य है। शब्द ब्रह्म अशक्त मानव के लिए पहचानना असम्भव है। मीमांसा दर्शन का सूत्र 1/3/28 कहता है- ”शुद्ध शब्द ज्ञान की अशक्ति के कारण अपभ्रंश शब्दों का जन्म होता है।“ इससे स्पष्ट है कि सारे अपभ्रंश शब्द, सारे आधे-अधूरे शब्द, निरर्थ शब्द, मिलावटी शब्द, हिंगलीश शब्द, हिंगलीश भाषा कमजोरी या अशक्ति की निशानी है। अपनी कमजोरी या अशक्ति या भाषा अपाहिजता छिपाने के लिए भाषा कुसंस्कारी लोग सस्ती हिन्दी तथा हिंगलीश हिन्दी का स्वयं प्रयोग करते हैं तथा इसकी वकालत भी करते हैं। हमारा दायित्व है कि हम ऐसे लोगों को इनकी नाप सीमा तक काट दें। 
          आज भारतीय हिन्दी भाषा का संस्कार करना एक अति महती आवश्यकता है। यदि हिन्दी भाषा का वर्तमान में संस्कार न किया गया तो यह “जब व्ही मेट“, “किस्मत कनेक्शन”, “इमोशनल अत्याचार”, “ईलू-ईलू” आदि के रूप में संस्कृत के आचार्यों के मुंह से भी प्रयुक्त होते बिखर-बिखर ठेठ ग्रामीण भाषा से भी निम्न स्तर प्राप्त कर नष्ट होने के कगार तक पहुंच जाएगी। हिन्दी भाषा को संस्कारित करने के लिए महती आवश्यकता है कि हमें महर्षि दयानन्द सरस्वती, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिली शरण गुप्त, जैनेन्द्र, आचार्य चतुरसेन शाश्त्री, वृन्दावन लाल, कन्हैयालाल मुंशी, कुबेरनाथ राय मनुज, विद्यानिवास मिश्र, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा आदि-आदि की ही भाषा को हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में लागू करना होगा। साहित्य जगत् को संस्कारिक भाषा सूर्य से ओत-प्रोत करना होगा।                        
स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

Wednesday, September 22, 2010

“परमात्मा और तुम ..!”

1.    याद रखो तुम अरबवें, खरबवें, नरबवें हो और परमात्मा पहला ही पहला है। परमात्मा दूसरा, न तीसरा, न चौथा, न पांचवां, न छठा, न सातवां, न आठवां, न नौवां, न दसवां, न सौवां, न करोड़वां, न अरबवां है वरन् पहला ही पहला है।
2.    जो दूसरा, तीसरा... करोड़वां, अरबवां परमात्मा पूजते हैं वे पहले तो अपने आप को धोखा देते हैं। वे परमात्मा नहीं झूठ पूजते हैं। वे झूठे और गलत होते हैं।
3.    गलत परमात्मा पूजक खुद के साथ-साथ परमात्मा को भी धोखा देते हैं। उन पर परमात्मा मानों हंसता है। उन्होंने स्वयं को स्वयं ही इस दयनीय स्थिति में डाला है।
4.    दशावतारों और कई कलियुगी भगवानों, इशों, बाबाओं, साइयों, बोध्ााओं, गुरुजियों आचार्यों, परमहंसों, स्वघोषित तथा मूढ़घोषित अवतारों में कहीं भी ईश्वर का नामोनिशान भी नहीं है। ये सारे के सारे भगवान भगवान नहीं गोरखधंधा हैं। दूसरे, तीसरे... करोड़वें आदि-आदि हैं। इन्होंने मानव को गलत-सलत, अड़िया-घटिया, बेअकल, अज्ञानी ही किया है। पर इसके साथ-साथ दुःखद स्थिति यह है कि ये सारे अपने आप को ज्ञानी समझते हैं।
5.    अपने जीवन में वे जितने घटिया परमात्मा पूजते हैं उतने ही वे पाखण्डी होते हैं।
6.    इससे बड़ा पाखण्ड और क्या हो सकता है कि काल से परे परमात्मा को लोग कालेश्वर मानें और अतिसीमित समय में सीमित रहनेवाली काली मूर्ति को वे कालेश्वर रूप में पूजें तथा उसका भौतिक प्रसाद भी खाएं।
7.    ब्रह्म या परमात्मा कालेश्वर है- काल के पार वर्तमान है। वह सतत अब$अब$अब=अब ही है। अर्थात् वह सदाही पहला है। तुम भी वह परमात्मा मत पूजो जो कभी था ही नहीं बीच में वर्तमान हुआ फिर बाद में रहा नहीं। मानसिक अपाहिजों का परमात्मा काल खण्डित या विकृत होता है।
8.    सावधान ! आठ, दस, पंद्रह दिन मात्र बैठाए गए परमात्मा किसी भी दृष्टि से परमात्मा नहीं होते हैं। इनको पूजनेवाला हर व्यक्ति मानसिक अपंग है क्योंकि वह चैतन्य है ये जड़ है। और अगर तथाकथित चैतन्य है तो अध्यारोपित मानव चैतन्यता मात्र कल्पित अंश है। घटिया की पूजा आदमी को घटिया ही करेगी। दस दिन का परमात्मा और तीन सौ पैंसठ दिन के तुम हो। तुम ऐसे परमात्माओं और देवियों से छत्तीस दशमलव पांच गुना बेहतर हो। जब बेहतर हो तो बेहतर रहो, अपनी बेहतरता का आदर करो। वह अनन्त परमात्मा पूजो जो अनन्त कालीन सम होने के कारण तुमसे बेहतर है।
9.    बौने लोग बौने परमात्मा चुनते हैं। अपंग लोग अपंग परमात्मा चुनते हैं। जड़ लोग जड़ परमात्मा चुनते हैं। दस दिनिया लोग दस दिनिया परमात्मा चुनते हैं। अप्राकृतिक लोग अप्राकृतिक परमात्मा चुनते हैं। स्वस्थ दो-दो हाथ-पांव, आंख, कान, नथुने, एक सिर, सामान्य धड़ आदि प्राकृतिक मनुष्य हैं। इससे हटकर शरीरवाला कोई भी हो वह अप्राकृतिक है। अतः पंच कसौटी खरा न उतरने के कारण मानव द्वारा अपूजनीय ही है।
10.    हास्यास्पद परमात्मा आदमी को भी हास्यास्पद बना दिया करते हैं। कार्टून परमात्मा आदमी को भी कार्टून बना देते हैं। क्या आप को नहीं दीखता कि कार्टून परमात्माओं का जुलूस निकलता है और सड़क पर फिल्मी प्यार गानों की धुनों पर हिजड़े लोग हाथ-पैर फैंकते हैं, ट्रकों पर वेश्याएं नाचती हैं और आप इसके लिए दान देते हैं।
11.    क्या आप को नहीं मालूम कि देवी पूजाओं, समारोहों, नाचों में कण्डोमों और कामोत्तेजक साधनों की बिक्री में तीन सौ प्रतिशत वृद्धि हो जाती है। ये सब इस बात के जीते-जागते प्रमाण हैं कि गलत भगवान, गलत देवियां पूजनेवाले लोग पतित ही नहीं महापतित हो जाते हैं। कार्टून भगवान पूजक घातक-पातक कार्टून हो जाते हैं।
12.    आपके कान थूकदान नहीं हैं। आप की आंखें कार्टून रूपदान नहीं हैं। आपका मन भीख दान या भीख कटोरा नहीं है। आपकी बुद्धि अज्ञान अविद्या दान नहीं है। अपनी रक्षा आप स्वयं करो।    
स्व.डॉ.त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय